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Saturday, 20 June 2020

भूखों की रिपोर्टिंग करना क्या गुनाह है?

प्रधानमंत्री के क्षेत्र में लोगों को खाना नहीं मिल रहा है, वे भूखे हैं। यह खबर लिखने पर पत्रकार सुप्रिया शर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई है। 

ऐसी खबर लिख कर पत्रकार ने कौन सा गुनाह किया जो उसके खिलाफ केस कर दिया गया? लोगों को अनाज न नसीब होने की शर्म क्या इससे धुंधली पड़ जाएगी? क्या लोगों को अनाज न मिलने के लिए पत्रकार ही जिम्मेदार थी? इसमें से अपराध क्या है, लोगों को खाना न मिलना या इसकी खबर जनता को बताना? 

कुछ दिन पहले जनसंदेश टाइम्स के एक पत्रकार ने लोगों के भूखे होने की खबर लिखी थी तो उन पर भी केस किया गया था। 

कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच गुजरात के एक पत्रकार ने खबर लिखी कि बीजेपी में ऐसी हलचल है कि रूपानी को हटाया जा सकता है। यह खबर लिखने वाले पत्रकार पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ। 

इन खबरों में ऐसा क्या है कि पत्रकारों को केस में फंसा दिया जाए? जनता की मुश्किलें कहना अपराध है तो क्या पत्रकारों को सिर्फ सरकारी-चालीसा पढ़ने की छूट है? 

द वायर पर कितने मुकदमे लादे गए, आपको मालूम ही है। भले ही उन मुकदमों का अंजाम ज़ीरो हो, लेकिन इससे पत्रकारों में भय पैदा किया जाता है कि सरकार से सवाल करोगे तो फंसोगे। चुप रहो तो बचे रहोगे। 

यह सिर्फ निंदनीय नहीं है। यह सरकारों की तरफ से देश के प्रति किया जा रहा अपराध है। पत्रकार चुप हो जाएंगे, भूख से मरते लोगों को लेकर भी सवाल नहीं पूछेंगे तो जयकारे में कभी कोई बाधा नहीं आएगी। 

पत्रकारिता की जरूरत सरकार को कभी नहीं होती। इसकी जरूरत जनता को होती है ताकि सरकार के धतकर्मों का पता चलता रहे। 

सरकार चाहती है कि आप खबरें न पढ़ें, आईटी सेल के गाली-गलौज से काम चलाएं। क्या आपको भी गाली गलौज के अलावा कुछ नहीं चाहिए? 

हाल में सरकार ने कमेटी बनाई है कि पत्रकारिता के वैश्विक इंडेक्स में भारत की स्थिति खराब हो गई है, इसे सुधारने पर काम किया जाए। 

पत्रकारिता का स्तर सुधारने के लिए कमेटी की जरूरत नहीं, सरकार को अपनी करनी सुधारने की जरूरत है। जिनपर लोकतंत्र बचाने का जिम्मा है, वही लोकतंत्र की पीठ में छुरा घोंपेंगे तो कमेटी क्या खाक बचा लेगी?

लेखक : कृष्ण कांत जी की वाल से साभार।

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